बोट्सिंग मलगियांग 14 साल के थे, जब उन्होंने पहली बार मेघालय में खासी समुदाय के लोगों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला इंस्ट्रूमेंट – कसिंग किन्थी बनाया था. अब, 60 साल की उम्र में वह अपने काम में मास्टर माने जाते हैं और कटहल की लकड़ी, मूगा रेशम के धागे, और बकरियों व गायों की खाल जैसी स्थानीय चीज़ें इस्तेमाल करके विंड इंस्ट्रूमेंट (सांस का इस्तेमाल करके बजाए जाने वाला), स्ट्रिंग वाले इंस्ट्रूमेंट और चार तरह के पर्कशन इंस्ट्रूमेंट बना सकते हैं.

वीडियो देखें: मेघालय में बाह बोट के ढोल से खासी धुन बज रही है. तस्वीरें: एमवी श्रीकांत

बोट्सिंग को मेघालय के पिनुरस्ला ब्लॉक में स्थित उनके गांव नोंग्ब्लाई में बाह बोट के नाम से जाना जाता है. जब वे आठ साल के थे, तब उनकी मां का देहांत हो गया; उनके पिता (अब इस दुनिया में नहीं) एक किसान थे, जो संतरे उगाते थे और झाड़ू भी बनाते थे. बाह बोट अपने परिवार में इस कला को सीखने वाले पहले व्यक्ति थे. उन्होंने सबसे पहले दूसरे कारीगरों को पर्कशन इंस्ट्रूमेंट बनाते हुए देखा और फिर इन्हें बनाने में हाथ आज़माया. इसे मुकम्मल तरीक़े से बनाने में उन्हें कुछ वक़्त लगा, और तब से अब तक उनकी यह प्रक्रिया जारी है, क्योंकि जैसा कि वह हमें बताते हैं: “मुझे लगता है कि संगीत को जीवित रखने की ज़िम्मेदारी मुझ पर है.”

बाह बोट, कसिंग किन्थी ड्रम बनाने के दौरान, अपने कामकाज की जगह पर बैठे हमसे बात करते हैं. यह जगह दरअसल उनके अपने घर के सामने का एक खुला मैदान है. उनके चारों ओर साफ़-सुथरे खाल के टुकड़े, औज़ार, कटहल के पेड़ की लकड़ी के टुकड़े पड़े हैं; खाल और लकड़ी की छीलन की पट्टियां भूरी घास में कहीं खो जाती हैं. वह कहते हैं, “मुझे कभी नहीं सिखाया गया कि इसे कैसे बजाया जाता है. असल में, मैंने गांव के त्योहारों, कार्यक्रमों, और तस्वीरों को छोड़कर, उनमें से बहुत से संगीतकारों को शायद ही हक़ीक़त में देखा हो. मेरी दिलचस्पी के कारण मैंने ख़ुद से एक इंस्ट्रूमेंट बनाने की शुरुआत की.”

बाह बोट के सबसे छोटे बेटे, 29 वर्षीय पाइनाप्लांग खोंग्स्नी इंस्ट्रूमेंट बनाने में उनकी मदद करते हैं और जब उनके पास थोक ऑर्डर आते हैं, तो वह दूसरे वर्कर्स को भी काम पर रख लेते हैं. लगभग तीन साल पहले, उन्हें राज्य सरकार के कला और संस्कृति विभाग से 200 पर्कशन इंस्ट्रूमेंट बनाने का एक बड़ा ऑर्डर मिला था. उस समय उन्होंने 11 लोगों को काम पर रखा था, जिन्होंने उनके साथ तीन महीने तक काम किया था; ताकि वह ऑर्डर को समय से पूरा कर सकें.

बाह बोट एक ऐसे संगीतकार हैं जिन्होंने संगीत अपनेआप सीखा है. वह ख़ुद के बनाए गए ड्रम बजा भी सकते हैं और पांच से छह लोगों के अपने ग्रुप के साथ परर्फ़ोर्म भी करते हैं. उनका कहना है कि उन्हें आसपास के गांवों में साल में लगभग चार त्योहारों में ड्रम बजाने के लिए बुलाया जाता है और उन्हें एक परफ़ॉर्म के लिए सामूहिक रूप से लगभग 15,000 रुपए मिलते हैं. बाह बोट कहते हैं, “बहुत से लोग इस पारंपरिक संगीत को नहीं बजा सकते हैं, इसलिए वे इस काम के लिए हमें बुलाते हैं.”

तंगमुरी वादक और शिलांग के मार्टिन लूथर क्रिश्चियन यूनिवर्सिटी में संगीत के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, 36 वर्षीय ई. पिंडपबोर खोंगजिरेम कहते हैं कि पारंपरिक खासी इंस्ट्रूमेंट की आवाज़ में जंगल की ध्वनियां शामिल होती हैं: “जब हमारे लोग जंगलों में रहते थे, तो उन्होंने अपने आसपास से अलग-अलग कीड़ों, पक्षियों वगैरह की ध्वनियों को ध्यान से सुना और उन्हें सीखने की कोशिश की. समाज के विकास के साथ-साथ, उपकरणों का विकास होता गया.”

अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचीबद्ध खासी समुदाय में साल भर त्योहार मनाए जाते हैं, जिसमें बाह बोट के बनाए ड्रम की मांग होती है. अप्रैल में होने वाले थैंक्सगिविंग फेस्टिवल में, का बॉम, का कसिंग शिनरंग, का कसिंग किंथी और का तंगमुरी जैसे पर्कशन इंस्ट्रूमेंट और मंजीरे के संगीत पर लोग ‘शाद’ डांस करने के लिए इकट्ठा होते हैं.

नवंबर में, शाद नोंग्क्रेम त्योहार पांच दिन लगातार चलता है और इसमें गांव के लोग फ़सल की अच्छी पैदावार और समृद्धि के लिए ‘का ब्ली सिंसार’ देवी की पूजा करते हैं. बाह बोट बताते हैं कि ड्रम को खासी में स्किट नामक लयबद्ध चक्रों में पीटा जाता है.

उनके नियमित ग्राहकों में गांव की समितियां शामिल हैं, जिन्हें डोरबार श्नोंग के नाम से जाना जाता है. ये समितियां त्योहारों में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की ख़रीद करती हैं. बाह बोट को कुछ संगीत कॉलेजों और मेघालय सरकार के कला और संस्कृति विभाग से भी कभी-कभार ऑर्डर मिलते हैं.

इनकी क़ीमत, एक ‘का बॉम’ (बड़ा ड्रम) के लिए 12,000 रुपए से लेकर, एक ‘का पडिया’ (छोटे ड्रम) के लिए 2,500 रुपए तक होती है. जब वह नोंग्ब्लाई गांव में रहते थे, तो उनके ग्राहकों को उन तक पहुंचने में काफ़ी मुश्किल होती थी, क्योंकि यह जगह एक घाटी में 4,000 क़दम नीचे की तरफ़ है, जहां तक कोई भी सड़क नहीं जाती. इसलिए, कुछ साल पहले उन्होंने पूर्वी खासी हिल्स ज़िले के पिनुरस्ला ब्लॉक के वहलिंग्खट गांव में एक घर बनाया, जहां लोग आसानी से आ-जा सकते हैं. वह बताते हैं, “मैं अपने काम के अनुसार, इन दोनों जगहों पर आता-जाता रहता हूं. अगर खेतों में काम करना होता है, तो मैं नोंग्बलाई जाता हूं; अगर इंस्ट्रूमेंट का ऑर्डर आता है, तो मैं वहलिंग्खट में रहता हूं. ”

बाह बोट हमें नोंग्ब्लाई गांव दिखाते हैं, जो 4,000 क़दम नीचे की तरफ़ घाटी में स्थित है और वहां तक कोई सड़क नहीं जाती. तस्वीरें: एमवी श्रीकांत

बाह बोट के सभी बच्चे शादीशुदा हैं और आसपास के गांवों में रहते हैं. 56 साल की उनकी पत्नी साइफ़न खोंग्स्नी अपने एक बच्चे के साथ रहती हैं. उनके चार बेटे हैं – पाइनेह्लांग खोंग्स्नी (38), फ़िरनैलांग खोंग्स्नी (34), पिंडाप्लांग खोंग्स्नी (32), पिनाप्लांग खोंग्स्नी (29). और एक बेटी है – स्नगेवभलांग खोंग्स्नी (36).

ड्रम बनाने का हुनर

बाह बोट ड्रमों को बनाते हुए, पहले बकरी और गाय की खाल पर लगे फर को साफ़ करते हैं, फिर इसे सारी रात पानी में भीगने के लिए छोड़ देते हैं. इस बीच, वह खासी में ‘तारी’ नाम के एक ख़ास तरीक़े के फ़ोल्डेबल (मोड़े जा सकने वाले) चाकू का इस्तेमाल करके लकड़ी को आकार देते हैं.

जैसे ही ड्रम आकार लेना शुरू करता है, वह बांस की लकड़ी का एक गोलाकार जोड़ बनाते हैं, जो ड्रम के किनारे की चमड़ी को पकड़ लेता है. छीनी का इस्तेमाल करते हुए, वह ड्रम के किनारों पर चमड़ी को ठीक से बिठाते हैं. आख़िर में, वह प्लास्टिक के उन लंबे धागों पर मेटल के छल्ले जोड़ते हैं जो खाल के दोनों किनारों को एक साथ जोड़े रखते हैं. इन छल्लों का इस्तेमाल ड्रम को ट्यून करने के लिए किया जाता है. वह लकड़ी के खोखले हिस्से में छोटे छेद बनाने के लिए एक गिमलेट (औज़ार) का इस्तेमाल करते हैं और उस हिस्से को चिकना करने और आकार देने के लिए रेगमाल पेपर का इस्तेमाल करते हैं.

तंगमुरी, सात छिद्रों वाला एक विंड इंस्ट्रूमेंट है. इसे बनाने में ज़्यादा मेहनत लगती है और इसे बहुत ही बारीक़ तरीक़े से बनाया जाता है. इसमें वह छेद बनाने के लिए मेटल की गर्म छड़ का इस्तेमाल करते हैं. अच्छी तरह से समझ-माप करके, सावधानी से ड्रिल किया जाता है और सात छेद बनाए जाते हैं. इन इंस्ट्रूमेंट को बनाने में लंबा वक़्त लगता है; दो दिन से लेकर 15 दिन. यह भी इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सा इंस्ट्रूमेंट बनाया जा रहा है.

इन इंस्ट्रूमेंट की मांग घट रही है और एक साल में बाह बोट को लगभग चार से पांच सेट के ऑर्डर मिलते हैं. राज्य सरकार अपने कला और संस्कृति विभाग के माध्यम से खासी संगीत को बढ़ावा देने के लिए, वर्कशॉप और कार्यक्रमों को सामने ला रही है. नतीजतन, मेघालय के सेंट एंथनी कॉलेज, मार्टिन लूथर क्रिश्चियन यूनिवर्सिटी, और नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी जैसे अलग-अलग शैक्षणिक संस्थानों में यह इंस्ट्रूमेंट अकादमिक पाठ्यक्रम और परफ़ॉर्मेस का हिस्सा रहता है.

अपनी शिल्पकला के सांस्कृतिक महत्व के बावजूद, बाह बोट अपनी आजीविका के लिए सिर्फ़ इस पर निर्भर नहीं रह सकते. वह जंगल में पैदा होने वाले सुपारी इकट्ठा करते हैं, झाड़ू बनाते हैं (साल में 20 से 25 क्विंटल), अपने 3,000 पेड़ों के बाग में संतरे उगाते हैं और सूअर व मुर्गियां भी पालते हैं. बाह बोट कहते हैं, ”इन सबसे मैं हर महीने 16,000 रुपए तक कमा लेता हूं.”

हर शाम, गांव के उनके दोस्त और दूसरे युवा लोक संगीतकार, अपने रोज़मर्रा के काम निपटाने के बाद संगीत और खासी संस्कृति के बारे में बातचीत करने के लिए बाह बोट से मिलने आते हैं. ये ऐसा वक़्त होता है जब बाह बोट गाते भी हैं. बाह बोट के दोस्त और पड़ोसी गांव पिन्टर के एक लोक संगीतकार शिबोर मॉकोन कहते हैं, “वह ऐसे गीत गाते हैं जिनमें कोई लीरिक्स नहीं होती, जो उनसे भी ज़्यादा पुराने होते हैं, और जंगल की याद दिलाते हैं.”

हर शाम, गांव के उनके दोस्त और दूसरे युवा लोक संगीतकार, अपने रोज़मर्रा के काम निपटाने के बाद संगीत और खासी संस्कृति के बारे में बातचीत करने के लिए बाह बोट से मिलने आते हैं. ये ऐसा वक़्त होता है जब बाह बोट गाते भी हैं. तस्वीरें: एमवी श्रीकांत

वह ‘का बॉम’ उठाते हैं और अपने दोस्त के साथ संगत शुरू करने से पहले, कहते हैं, “मैं यह नहीं कह सकता कि भविष्य में इस शिल्पकला का क्या होगा. जब लोग ईसाई धर्म में परिवर्तित हुए, तो उन्होंने इस पारंपरिक संगीत को ज़्यादा तवज्जो नहीं दिया. लेकिन, आजकल वे अपनी जड़ों को पहचानने लगे हैं और उन्हें महत्व देने लगे हैं, और कुछ चर्चों में भी वे [खासी] इंस्ट्रूमेंट उपयोग करते हैं. तो, कुछ उम्मीद अभी बाक़ी है.”


खासी संस्कृति में संगीत की जगह

खासी संस्कृति में हर इंस्ट्रूमेंट का अपना स्थान है और उसे किसी परिवार के सदस्यों की तरह माना जाता है. कसिंग शिनरंग को मेल ड्रम के रूप में मशहूर है और पिता और मामा के रूप में खासी पुरुषों की दोहरी भूमिका का प्रतिनिधित्व करता है. इसलिए, ड्रम का बायां हिस्सा पिता के दयालुता को दिखाता है और ड्रम का दाहिना हिस्सा उसके कठोर पक्ष को दिखाता है, जिसे छड़ी का इस्तेमाल करके बजाया जाता है.
किसी आम खासी परिवार की तरह ही, दुईतारा में चार स्ट्रिंग होते हैं – पहली स्ट्रिंग चाचा/मामा का प्रतिनिधित्व करती है; दूसरी और तीसरी स्ट्रिंग एक साथ बंधी होती है और एक ही नोट में ट्यून की जाती हैं, जैसे कि माता-पिता आपसी रिश्ता, और चौथी स्ट्रिंग ऊंची पिच में, पूरे परिवार का प्रतिनिधित्व करती है.

खासी परंपरा में, कसिंग किन्थी और कसिंग शिनरंग को कभी भी एक साथ नहीं बजाया जाता है, क्योंकि वे माता और पिता का प्रतिनिधित्व करते हैं; और जब दोनों इंस्ट्रूमेंट एक साथ बजाए जाते हैं, तो यह उनके बीच हुई लड़ाई का प्रतीक माना जाता है. इसलिए, वे हमेशा अलग-अलग बजाये जाते हैं – जब एक बोलता है, तो दूसरा सुनता है.

‘का दुइतारा’ लोक गीतों के साथ आमतौर पर रात में अलाव जलाने के साथ बजाया जाता है. ‘का शाद किन्थी’ डांस करने के साथ कसिंग किन्थी (फ़ीमेल ड्रम) और ‘का शाद शिनरंग’ (केवल पुरुषों का नृत्य) के साथ कसिंग शिनरंग (मेल ड्रम) को बजाया जाता है. ‘का बॉम’ और ‘का पडिया’ संगीत की लय को बनाए रखने के लिए बजाया जाता है, जबकि ‘का तंगमुरी’ एक आउटडोर इंस्ट्रूमेंट है और इसे केवल त्योहारों में बजाया जाता है.

बंशैलांग मुखिम के माध्यम से – शाद नोंग्क्रेम डांस फ़ेस्टिवल के संगीतकार और परफ़ॉर्मर.

Editor's note

एमवी श्रीकांत ने हाल ही में शिलांग की इंग्लिश एंड फ़ॉरेन लैड्ग्वेज यूनिवर्सिटी से मास कम्यूनिकेशन में ग्रेजुएशन की डिग्री पूरी की है. वह म्यूज़िक इंस्ट्रूमेंट में रुचि रखते हैं और ग्रामीण भारत में संगीत की विविधता पर काम करना चाहते हैं. शिलांग में पढ़ाई के दौरान, उन्होंने खासी पारंपरिक संगीत के बारे में सुना और इसके बारे ज़्यादा जानने के इच्छुक हुए. वह कहते हैं: "पारी एजुकेशन के साथ काम करके मुझे एक नया नज़रिया मिला है - अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों के जीवन को देखना और उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में शामिल चीज़ों को ठहरकर बारीक़ नज़र से देखना." अनुवाद: नीलिमा प्रकाश नीलिमा एक कवि-लेखक, कंटेंट डेवेलपर, फ़्रीलांस अनुवादक, और भावी फ़िल्मकार हैं. उनकी रुचि हिंदी साहित्य में है. संपर्क : neelima171092@gmail.com