Dreams in rural Odisha

By Babaloo Sahoo, Jajati Mohanta, Lipun Behera, Priyamudra Nayak and Satyabhama Majhi

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Our students live across hamlets and villages in Danagadi block of Odisha’s Jajapur district. During the Covid-19 lockdowns, we held classes in their villages. Drums and dreams beyond pickle and papad was one of the PARI stories we used to teach our Class 6, 7, 8 and 9 students about gender, incomes, social pressures and more.

Satyabhama Majhi, 22, New Siaria hamlet, Trijanga gram panchayat: “Two months after I taught this story, a few women told me they had begun doing kirtans or performances at festivals and programmes in our village. They had overheard the story while I was teaching their children. 

I felt so good to hear they were coming together to do this! Now after finishing their work at home, they practice every afternoon from two to five. At performances, they sing devotional songs while playing the jhanja [tambourine] and tala [hand cymbal]. They also wear matching saris, like those worn by the Sargam Mahila Band.” 

Lipun Behera, 25, Bandhasahi hamlet: “I noticed that the children used this story to think about the work their mothers and grandmothers do at home and outside home. One student asked: ‘Why did the girls take up boys’ work?’ This question came up more than once. 

I was able to use the story to explain the meaning of gender roles – how in society, work is often divided on the basis of gender. They began to understand what courage it takes for women to take up men’s work. One student observed: ‘This was their ishashakti [goal]. Slowly, they learned and practiced playing the drum. This is how they have been able to earn.’

The children drew and made charts based on the story. Ananya Khatua of Class 7, Sipa Khatua and Puja Behera of Class 8, wrote in their chart: ‘It felt good to see the willpower of the women and how they worked and gained expertise in these musical instruments. Then they made a name in their state and the country.’”  

Jajati Mohanta, 26, Rangahudi hamlet, Dhamana Gadia:  “I asked my students to make posters of what they learned from this story. Two students drew an eagle and a plane around the women’s ‘band-party’. They had drawn an eagle because it, ‘had come to listen to the women’s music and a plane because these women travel across the country to perform.’

This poster was made by Akash Mohanta of Class 6, Sunia Munda and Dasama Sirka of Class 7 at Raghunath Memorial U.P school in Rangahudi hamlet, Dhamana Gadia village in Danagadi block in Jajapur district and Chittaranjan Mohanta, a Class 8 student of Sri Aurobindo Integral School, in Byasanagar town, in Korai block, Jajapur district 

Students shared how in their own homes, women are not encouraged to go out and work. In previous classes, we had read a text titled ‘What Mother Does’ and the children noticed that their fathers don’t do their ‘mother’s work’ at home. After reading this story they went home and shared it with their family.  

I paired this PARI story up with Duttee Chand’s story of how she became an Olympic athlete – something we had covered before in class. The children connected hard work to success, and learned the importance of dedication, self-confidence, discipline and focus when pursuing a goal.”

Priyamudra Nayak, 23, Mangal Pur: “‘We are so small now,’ one of my Class 5 students told me, ‘They also must have been small. When we grow up, we will also do something.’ The older students asked us teachers to support them in whatever they aim to do in the future. All my students spoke about talking to women in their own homes, in hopes they too do something like these 10 women did in Bihar.”

Babaloo Sahoo, 22, a teacher in Badabil village: “My students wanted to meet the women in this band and listen to their music! It’s the first time they are showing interest to meet the people they learn about in class. They were happy to see the band perform in the video in the story. 

Babaloo and his student, Saritarani Pagad, of Class 6, watching a performance of the Sargam Mahila Band

Students also asked about how the women in this story arranged fees for the teacher who taught them, what challenges they faced and how they managed housework and their band’s work. Something that came up often was: ‘We’ve only seen men come to the village to play drums. How do I convince my family to play like these women?’ The students thought it was ‘men’s-work’ before they read this story. By teaching it, we can change this thought-process and encourage them to dream bigger. The story taught my students that women are no less than men. Women can do anything.”

See their students’ art ‘Drums, dreams and drawings’ on the PARI Education website.

This initiative by non-governmental organisation ASPIRE and Tata Steel Foundation aims to bring stories of inspiring rural women into the classroom. The story helped the teachers explore caste, gender, incomes and other issues with their students.

ओडिशा के ग्रामीण इलाक़ों में – सपनों को मिले पंख

हमारे छात्र ओडिशा के जाजपुर ज़िले के दानागाड़ी ब्लॉक के गांवों और बस्तियों में रहते हैं. कोविड-19 तालाबंदी के दौरान हमने गांवों में कक्षाएं लगाईं. पारी द्वारा प्रकाशित ‘अचार और पापड़ से आगे ढोल और सपने‘, जैसी कहानियों के माध्यम से हमने कक्षा 6, 7, 8 और 9 के छात्रों को जेंडर, आजीविका, सामाजिक दबावों, एवं अन्य महत्त्वपूर्ण सामाजिक कारकों के बारे में पढ़ाया.

त्रिजंगा ग्राम पंचायत, न्यू सियरिया बस्ती की 22 वर्षीय सत्यभामा मांझी बताती हैं, “इस कहानी को पढ़ाने के दो महीने बाद, कुछ महिलाओं ने मुझे बताया कि उन्होंने हमारे गांव में त्योहारों और कार्यक्रमों में कीर्तन या अपनी कला का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया है. जब मैं बच्चों को पढ़ा रही थी, तब उन्होंने ये कहानी सुन ली थी. मुझे बहुत अच्छा लगा कि वे ऐसा करने के लिए एकजुट हुईं! अब वे घर पर अपना काम ख़त्म करके हर रोज़ दोपहर दो बजे से पांच बजे तक अभ्यास करती हैं. प्रदर्शनी के दौरान वे झांजा [टैम्बोरिन] और ताला [हाथ की झांझ] बजाते हुए भक्ति गीत गाती हैं. सरगम महिला बैंड की तरह वे भी एक जैसी साड़ियां पहनती हैं.”

बंधासाही बस्ती के 25 वर्षीय लिपुन बेहरा कहते हैं, “मैंने देखा कि बच्चों ने इस कहानी के प्रभाव में आकर ये सोचना शुरू किया कि उनकी मां और दादी घर पर और घर के बाहर क्या काम करती हैं. एक छात्र ने पूछा: ‘लड़कियां क्यों लड़कों का काम करती हैं?’ ये सवाल कई बार पूछा गया.

मैंने इस कहानी के माध्यम से उन्हें लैंगिक भूमिकाओं के बारे में समझाया कि कैसे हमारे समाज में लिंग के आधार पर काम को विभाजित किया गया है. उन्हें ये बात समझ आने लगी कि औरतों के लिए पुरुषों का काम करना कितने साहस की बात है. एक छात्र ने बताया: ‘ ये उनकी अपनी इच्छाशक्ति थी. धीरे-धीरे उन्होंने अभ्यास के ज़रिए ड्रम बजाना सीखा. इसी तरह वे अपनी आजीविका कमा पाने के योग्य बन पाई हैं.’

बच्चों ने कहानी के आधार पर चार्ट तैयार किया. कक्षा 7 की अनन्या खटुआ, कक्षा 8 की पूजा बेहरा और सीपा खटुआ ने अपने चार्ट में लिखा: ‘ये देखकर अच्छा लगा कि किस तरह से महिलाओं ने अपनी इच्छाशक्ति और मेहनत के बल पर इन वाद्ययंत्रों को बजाने में महारत हासिल की है. उन्होंने अपने राज्य में ही नहीं, पूरे देश में नाम कमाया है.'”

धमाना गड़िया के रंगाहुडी गांव के 26 वर्षीय जजाति मोहंता बताते हैं, “मैंने अपने छात्रों से कहा कि जो भी उन्होंने इस कहानी से सीखा उसका वे पोस्टर बनाकर लाएं. दो छात्रों ने औरतों की ‘बैंड-पार्टी’ के आस-पास एक बाज़ और एक विमान की तस्वीर बनाई. बाज़ की तस्वीर उन्होंने इसलिए बनाई कि वह महिलाओं का संगीत सुनने आया था और विमान के ज़रिए उन्होंने ये दर्शाया कि ये महिलाएं प्रदर्शन के लिए देश भर में यात्राएं करती हैं.’

इस पोस्टर को कक्षा 6 में पढ़ने वाले आकाश मोहंता, कक्षा 7 में पढ़ने वाली सुनिया मुंडा, और दसामा सिरका और कक्षा 8 के चित्तरंजन मोहंता ने बनाया है. आकाश, सुनिया, और दसामा जाजपुर ज़िले में दानागाड़ी ब्लॉक के धामन गड़िया गांव के रंगाहुडी बस्ती के रघुनाथ मेमोरियल यू.पी स्कूल में, और चित्तरंजन जाजपुर में ही कोरई ब्लॉक के ब्यासानगर क़स्बे के श्री अरबिंदो इंटीग्रल स्कूल में पढ़ते हैं

छात्रों ने बताया कि किस तरह से उनके घर में महिलाओं को घर से बाहर निकलकर काम करने पर पाबंदी है. पहले की कक्षाओं में हमने ‘मां क्या काम करती है’ के शीर्षक से कहानी पढ़कर सुनाई, जिसके बाद बच्चों ने बताया कि उनके पिता घर पर ‘मां के कामों’ में हिस्सा नहीं लेते. इस कहानी को पढ़ने के बाद उन्होंने परिवार के लोगों से इस कहानी के बारे में बात की.

मैंने पारी की इस कहानी के साथ उन्हें दुती चंद की कहानी भी सुनाई कि कैसे वह एक ओलंपिक एथलीट बनी. हम पहले भी अपनी कक्षा में इस कहानी के बारे में बता चुके थे. बच्चों ने सीखा कि किस तरह से सफ़लता कड़ी मेहनत के बलबूते हासिल की जाती है और किसी लक्ष्य का पीछा करने के लिए समर्पण, अनुशासन, आत्मविश्वास, और ध्यान की ज़रूरत होती है.”

मंगलपुर की 23 वर्षीय प्रियमुद्रा नायक ने बताया: “कक्षा 5 में पढ़ने वाले एक छात्र ने मुझसे कहा, ‘हम अभी बहुत छोटे हैं. और वे लोग भी कभी छोटे रहे होंगे. जब हम बड़े हो जाएंगे, तो हम भी कुछ करेंगे.’ बड़ी उम्र के छात्रों ने हम शिक्षकों से कहा कि वे चाहते हैं कि भविष्य में हम उनके लक्ष्यों को पूरा करने में उनका साथ दें. मेरे सभी छात्रों ने बताया कि कैसे उन्होंने अपने घर की औरतों से इस उम्मीद के साथ चर्चा की है कि वे भी बिहार की उन दस औरतों की तरह कुछ करके दिखाएं.”

बड़बिल गांव के एक शिक्षक बबलू साहू (22 वर्ष) ने अपना अनुभव साझा किया: “मेरे छात्र उस बैंड की औरतों से मिलना और उनका संगीत सुनना चाहते थे! ऐसा पहली बार हुआ कि उन्होंने कक्षा में किसी के बारे में सुनकर उनसे मिलने की इच्छा व्यक्त की. वे बैंड का वीडियो देखकर काफ़ी ज्यादा खुश थे.

बबलू और कक्षा 6 में पढ़ने वाली उनकी छात्र सरितारानी पगड़, सरगम महिला बैंड की एक परफ़ॉर्मेंस देखते हुए

छात्र ये भी जानने के लिए उत्सुक थे कि आख़िरकार इस कहानी में शामिल महिलाओं ने प्रशिक्षण हासिल करने के लिए फ़ीस कैसे जुटाई, किस तरह की चुनौतियों का सामना किया, और बैंड के काम और घरेलू कामों के बीच तालमेल कैसे बिठाया. जिस बात पर सबसे ज़्यादा चर्चा हुई, वह थी: ‘हमने गांवों में हमेशा पुरुषों को बैंड बजाते हुए देखा है. मैं अपने परिवार को इन महिलाओं की तरह बैंड बजाने के लिए कैसे मनाऊं?’ इस कहानी से पहले छात्रों को यही लगता था कि ये ‘पुरुषों का काम’ है. लेकिन इसे पढ़ाकर हमने न सिर्फ़ उनकी सोच में बदलाव किया, बल्कि उन्हें बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित किया. इस कहानी से मेरे छात्रों ने ये बात सीखी कि औरतें पुरुषों से कम नहीं हैं. औरतें कुछ भी हासिल कर सकती हैं.”

पारी एजुकेशन वेबसाइट पर इन छात्रों द्वारा बनाए गए पोस्टर ‘ड्रम, सपने, और चित्र‘ देखें.

ग़ैर-सरकारी संगठन एस्पायर और टाटा स्टील फ़ाउंडेशन द्वारा शुरू की गई इस पहल का मक़सद ग्रामीण महिलाओं के जीवन से जुड़ी प्रेरणादायी कहानियों को स्कूली शिक्षा के रूप में शामिल करना है. इस कहानी के ज़रिए, शिक्षकों को अपने छात्रों से जाति, लिंग, आजीविका, और अन्य मुद्दों पर चर्चा करने में मदद मिली.

अनुवाद: प्रतिमा
प्रतिमा एक काउन्सलर हैं और फ़्रीलांस अनुवादक के तौर पर भी काम करती हैं.

About the teacher

Babaloo Sahoo, Jajati Mohanta, Lipun Behera, Priyamudra Nayak and Satyabhama Majhi shared the PARI story, 'Drums and dreams beyond pickle and papads' with their students in classes 6, 7,8 and 9.

बबलू साहू, जजाति मोहंता, लिपुन बेहरा, प्रियमुद्रा नायक, और सत्यभामा मांझी ने कक्षा 6, 7,8 और 9 में पढ़ने वाले अपने छात्रों से पारी की कहानी 'अचार और पापड़ से आगे ढोल और सपने' के बारे में चर्चा की.

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