A buffalo story for primary school

By Rajmani Kumari

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I read the story In Jabarra: till the buffaloes come home to my students from classes 4 and 5. The story is set in Chhattisgarh, not very far from Bihar where we are.

As soon as I reached school early in the morning, I heard the playful laughter of children. Then the bell rang – it was prayer time in Ravirai Tola Farda, a middle school, in Munger district, Bihar. All the students formed a line and began to pray. Meanwhile, I was busy thinking of the story that I would be sharing with them. It was a long one and there were some words in it that I felt would be difficult for them to understand. 

After the morning assembly, nearly 30 of them were in class when I wrote the title of this PARI story on the blackboard, hoping to connect it to the world around them. I asked them about which animals they take care of at home and if they knew where to find the nearest forest and grazing lands. Once I started talking to them about what they experienced every day, they were interested in what I had to say and listened to me closely. 

I thought: Why don’t I read one paragraph and then ask the students to read the others one by one? A few students volunteered for the task, and the rest of the class answered my questions in-between paragraphs to make sure I had their attention. 

With this technique, we were able to finish reading about Vishalram Markam and his buffaloes, in Dhamtari Zila, Chattisgarh. My students were fascinated by how his buffaloes wandered away on their own in the forest and returned home at dusk. 

I ended this class with a fun activity. Their school day had begun with my class, and I thought it was important to give them an energy boost for the rest of the day. They enjoyed every bit of it, and I left the class with a big smile on my face.

The PARI Education team would like to thank student interns, Eesha Acharya and Rohan Chopra for their enthusiasm and support in putting together this blog.

प्राथमिक स्कूल के बच्चे और भैंसों की कहानी 

मैंने कक्षा 4 और 5 के अपने छात्रों को एक स्टोरी पढ़कर सुनाई: भैंसों के घर लौटने तक अटकी रहती हैं जबर्रा के मरकाम की सांसें. इस स्टोरी की पृष्ठभूमि में छत्तीसगढ़ है, जो बिहार से बहुत दूर नहीं है; जहां हम रहते हैं.

मैं सुबह-सुबह जैसे ही स्कूल पहुंची, मुझे बच्चों की खिलंदड़ हंसी की आवाज़ सुनाई दी. तभी स्कूल की घंटी बजी – जिसका मतलब था कि बिहार के मुंगेर ज़िले में स्थित इस पूर्व माध्यमिक स्कूल, रविराय टोला फरदा में प्रार्थना का समय हो गया था. सारे बच्चे एक पंक्ति में खड़े हुए और उन्होंने प्रार्थना शुरू की. इस बीच, मैं उस कहानी को लेकर सोच में पड़ी हुई थी जिसे बच्चों को सुनाने वाली थी. वह कहानी काफ़ी लंबी थी और उसमें कुछ शब्द ऐसे इस्तेमाल हुए थे जिन्हें समझना बच्चों के लिए मुश्किल हो सकता था; ऐसा मुझे लग रहा था. 

प्रार्थना सभा ख़त्म होने के बाद, क़रीब 30 बच्चे कक्षा में मौजूद थे. मैंने ब्लैकबोर्ड पर पारी की इस स्टोरी का शीर्षक इस उम्मीद के साथ लिखा कि इसे उनके आसपास की दुनिया से जोड़ सकूं. मैंने बच्चों से पूछा कि वे घर पर किन जानवरों का रखरखाव करते हैं, और सबसे नज़दीक स्थित जंगल और चारागाहों के बारे में वे जानते हैं या नहीं. जब मैंने उनके रोज़मर्रा के अनुभवों के बारे में बातचीत शुरू की, तो मेरी बातों के प्रति उनमें आकर्षण पैदा हुआ और वे ध्यान से सुनने लगे.

मैंने सोचा: क्यों न एक पैराग्राफ़ मैं पढूं, और आगे के पैराग्राफ़ एक-एक करके बच्चों से पढ़ने को कहूं? कुछ बच्चे कहानी पढ़ने के लिए आगे आए, और कक्षा के बाक़ी बच्चे दो पैराग्राफ़ों के बीच में मेरे द्वारा पूछे जाने वाले सवालों के जवाब देते रहे, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मेरी बातों को वे ध्यान से सुन रहे हैं.

इस तरीक़े को अपनाकर, हम छत्तीसगढ़ के धमतरी ज़िले के विशालराम मरकाम और उनकी प्यारी भैंसों की कहानी पूरी कर सके. मेरे छात्र इस बात पर मुग्ध थे कि उनकी भैंसें किस तरह जंगलों में चरने के लिए ख़ुद ही भटकती फिरती हैं और शाम को घर लौट आती हैं.

मैंने कक्षा को एक मनोरंजक गतिविधि के साथ समाप्त किया. स्कूल के आज के दिन की उनकी शुरुआत मेरी कक्षा से हुई थी, इसलिए मैंने सोचा कि बाक़ी की कक्षाओं के लिए उनके अंदर उत्साह का संचार करना ज़रूरी है. बच्चों ने इसका जमकर लुत्फ़ उठाया ही, और मैं भी अपने चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान लिए कक्षा से बाहर निकली.

पारी एजुकेशन की टीम, इस ब्लॉग को तैयार करने में उत्साह दिखाने और इसमें मदद के लिए, स्टूडेंट इंटर्न ईशा आचार्य और रोहन चोपड़ा का धन्यवाद करती है.

About the teacher

Rajmani Kumari is a second-year student from RD & DJ College in Munger district, Bihar. She is doing her B.A in Hindi, and has been working with a non-governmental organization, i-Saksham, since the past two years. 

राजमणि कुमारी, बिहार के मुंगेर ज़िले में स्थित आरडी एंड डीजे कॉलेज में द्वितीय वर्ष की छात्र हैं. वह हिंदी विषय में बीए की पढ़ाई कर रही हैं, और पिछले दो वर्षों से एक गैर-सरकारी संगठन ‘आई-सक्षम’ के साथ काम भी कर रही हैं.

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