इस साल की शुरुआत में, शाहजी धनुरे ने हरली गांव में अपने 2 एकड़ के खेत में एक नया बोरवेल लगाने का निर्णय लिया था. उन्हें अपनी फ़सल की बहुत चिंता थी; उनके खेत का कुआं पूरी तरह से सूख चुका था. महाराष्ट्र के उस्मानाबाद ज़िले में गर्मियां सूखी और गरम होती हैं और तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के ऊपर होता है. उनको लगा कि बोरवेल लगाने से वह आराम से अच्छी फ़सल की उम्मीद कर सकते हैं. लेकिन, शाहजी को यह नहीं पता था कि राष्ट्रीय लॉकडाउन और बेमौसम बरसात उनकी सारी योजनाओं को डुबो देगी.

मार्च 2020 में शाहजी और उनके परिवार ने अपने खेतों में बोरवेल लगवाया था. 80-फ़ीट पर जल तक पहुंचने के बावजूद, उन्होंने सूखे की स्थिति में पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए, इसे 550 फ़ीट तक खोदा. लेकिन, अब वे भारी, बेमौसम बारिश के परिणामों से जूझ रहे हैं

मार्च में, शाहजी ने बोरवेल पर 1.2 लाख रुपए ख़र्च किए, जिसमें से उन्होंने 25,000 रुपए का क़र्ज़ एक स्वयं-सहायता समूह से 2 प्रतिशत मासिक ब्याज पर लिया था, जहां उनकी पत्नी पुष्पा धनुरे सदस्य हैं. उन्होंने 50,000 रुपए एक स्थानीय साहूक़ार से 5 प्रतिशत के मासिक ब्याज़ पर लिए. बाक़ी उन्होंने अपनी बचत में से लगाया. उन्होंने सोचा था कि सब्ज़ियां बेचकर जो पैसे आएंगे उससे वह अपना ऋण चुका देंगे. लेकिन जैसे ही उनकी आय होना बंद हो गई शाहजी ऋण चुकाने में असफल रहे और एक भी क़िस्त नहीं चुका पाए.

बैंक से ऋण न लेने का कारण वह बताते हैं, “मेरे पास मराठवाड़ा ग्रामीण बैंक का खाता है, लेकिन उन्होंने बहुत सारे काग़ज़ मांगे और वहां ऋण स्वीकृत करवाने के लिए कई बार जाना पड़ता है. जिस तरह मैंने क़र्ज़ लिया वह बहुत आसान है.” 

शाहजी की आयु 60-70 साल के बीच में है और उनके दो बच्चे हैं: उनकी 37 वर्षीय बेटी अनीता काले शादीशुदा हैं और उस्मानाबाद शहर में रहती हैं. उनका 35 वर्षीय बेटा शिवाजी धनुरे और 28 वर्षीय बहू अर्चना, उनके और उनकी पत्नी के साथ ही रहते हैं. शिवाजी और अर्चना भी खेत में काम करके उनकी मदद करते हैं. उनके तीन बेटे हैं: 15 वर्षीय अभिषेक, 9 वर्षीय आशीर्वाद, और 7 वर्षीय ओमकार, जो गांव में ही पढ़ते हैं.

बाएं से: शाहजी धनुरे, अपनी पत्नी (पुष्पा), बेटा (शिवाजी), बहू (अर्चना), और पोतों (ओमकार, आशीर्वाद, अभिषेक) के साथ

शाहजी बताते हैं, “मेरा परिवार सिर्फ़ खेती पर ही निर्भर है [जीवनयापन के लिए]. हमारे पास आय का कोई भी दूसरा स्रोत नहीं है. अगर हमारी फ़सल नहीं बिकती है, तो हमारे लिए ख़र्चा चलाना मुश्किल होगा.” हरली गांव के 1,252 लोग, 2011 की जनगणना में किसान और खेतिहर मज़दूर की श्रेणी में सूचीबद्ध हैं; उस्मानाबाद ज़िले के 77 प्रतिशत लोग प्राथमिक क्षेत्र में लगे हैं. 

गांव के पास टेरना नदी पर एक छोटा सा बांध है. लेकिन हरली के किसानों को उस बांध से पानी नहीं मिल पाता है, क्योंकि वे लोग ऊपर की तरफ़ रहते हैं. उसके बजाय वे लोग उन कुओं पर निर्भर रहते हैं जिनमें अच्छी बरसात के दिनों में पानी भर जाता है. महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में कई बार सूखा पड़ा है – साल 2012 और 2014 में विशेष रूप से गंभीर हालात बने हुए थे. उसकी वजह से साल 2015 में किसानों द्वारा की गई आत्महत्याओं में वृद्धि हुई.

अपनी दो एकड़ ज़मीन पर शाहजी सब्ज़ियां, और सोयाबीन, गेहूं और ज्वार जैसी वार्षिक फ़सलें उगाते हैं. वह प्याज़ और  सोआ, पालक, मेथी और भिंडी सहित अन्य सब्ज़ियां, तालुक़ा के मुख्यालय लोहारा की मंडी में बेचते हैं. हफ़्ते में एक बार मंडी आने-जाने में बस से 200 रुपए ख़र्च करने पड़ते हैं.

शाहजी के 550 फ़ीट गहरे बोरवेल लगाने के कुछ हफ़्तों बाद ही 23 मार्च को लॉकडाउन की घोषणा हो गई थी. वह अब और यात्रा नहीं कर सकते थे. उनकी सब्ज़ियों की फ़सल सड़ने लगी थी. वह जो कुछ भी स्थानीय मंडी में बेच सकते थे, उन्होंने बेचने की कोशिश की. शाहजी बताते हैं, “पालक, मेथी, सोआ ज़्यादातर 10 रुपए के 250 ग्राम के हिसाब से बिकते हैं, लेकिन लॉकडाउन में तीन से चार रुपए में बिके. आम तौर पर हरी मिर्च 40 रुपए प्रति किलोग्राम से बिकती है, लेकिन मुझे आधी क़ीमत से भी कम में बेचनी पड़ी.”

‘प्याज़ के भाव गिरते-चढ़ते रहते हैं. अगर आप की क़िस्मत अच्छी है, तो आप 50-60 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बेच सकते हैं, लेकिन उसके भाव पांच से छह रुपए प्रति किलो तक भी गिर सकते हैं.‘

वह मार्च में ख़त्म होने वाले रबी के सीज़न में उगाई प्याज़ के बारे में बताते हुए कहते हैं, “मेरी बहुत सारी प्याज़ सड़ गई. मैं कुछ ही प्याज़ बेच पाया, आठ से दस रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से.” रबी के मौसम में शाहजी औसतन 1,250 किलो प्याज़ उगा पाते हैं. वह बताते हैं, “प्याज़ के भाव गिरते-चढ़ते रहते हैं. यह जुएं जैसा है. अगर आप की क़िस्मत अच्छी है, तो आप 50-60 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बेच सकते हैं, लेकिन उसके भाव पांच से छह रुपए प्रति किलो तक भी गिर सकते हैं. मैंने लॉकडाउन की वजह से बहुत नुक़्सान झेला है.”

रबी के सीज़न में, शाहजी ज़्यादातर अपने परिवार के उपभोग के लिए गेहुं और ज्वार भी उगाते हैं और ख़रीफ़ के मौसम में वह सोयाबीन की खेती करते हैं. यह सारी उपज वह लातूर मंडी में बेचते हैं, जो हरली से क़रीब 55 किलोमीटर दूर है. वह दूसरे किसानों के साथ मिलकर जाते हैं और आने-जाने का किराया बांट लेते हैं.

फ़सल से होने वाली आय ज़्यादातर देर से ही आती है और अप्रत्याशित रहती है, दूध के पैसों से रोज़ का ख़र्च चलता है. शाहजी के पास एक जर्सी गाय है, एक छोटा बछड़ा, और एक भैंस का बछड़ा है. शाहजी की बहू अर्चना बताती हैं, “हमारी गाय एक दिन में क़रीब 10 लीटर दूध देती है और लॉकडाउन से पहले हमें रोज़ 250-280 रुपए मिल जाते थे.” लॉकडाउन के दौरान रेस्टोरेंट और मिठाई की दुकानें बंद थीं, जिसकी वजह से दूध की मांग और उसकी क़ीमत में भारी गिरावट आई. शाहजी की पत्नी पुष्पा बताती हैं, “लॉकडाउन के पहले चरण में हम एक हफ़्ते तक दूध नहीं बेच पाए और बाद में क़ीमत 25 रुपए प्रति लीटर से 18 रुपए प्रति लीटर तक गिर गई, जिसकी वजह से हमारे पास रोज़ के ख़र्चों के लिए रुपए नहीं थे.”

वर्षा ने डाली बाधा 

हरली के किसान जून में ख़रीफ़ की फ़सल बोते हैं, लेकिन इस साल सब्ज़ियों की बिक्री से हुई ख़राब आय की वजह से उनके पास रुपए नहीं बचे हैं. इस क्षेत्र में ख़रीफ़ फ़सल में सबसे ज़्यादा सोयाबीन होता है और शाहजी बताते हैं कि पहली बारिश के तुरंत बाद ही उन्होंने जून के दूसरे हफ़्ते में बीज ख़रीद लिए थे. “बीज के भाव बहुत बढ़ गए थे. पिछले साल मैंने सोयाबीन के बीजों के दो बैग 1,700 रुपए प्रति बैग [30-30 किलोग्राम के] की क़ीमत पर ख़रीदे थे; इस साल उसकी क़ीमत 2,200 रुपए हो गई थी.

ज्ञान प्रबोधिनि कृषि पॉलीटेक्निक के प्रोफ़ेसर और हरली में ही रहने वाले महेश राजे बताते हैं, “पिछले अक्टूबर और नवम्बर [2019] में सोयाबीन की पौध बेमौसम बरसात में भीग गई थी. इसके फलस्वरूप सोयाबीन के बीजों के उत्पादन में गिरावट आ गई थी और बीज बहुत महंगे हो गए थे.”

हरली गांव के एक अन्य किसान, अनिल रणखंब हमें अपनी सोयाबीन की उपज दिखाते हैं, जो उस भारी बरसात में भीग गई जिसमें खेत डूब गए थे. 

इस साल भी अक्टूबर में हरली में भारी बेमौसम बरसात हुई. अर्चना बताती हैं, “यहां लगातार 15 दिन तक बरसात होती रही और हर जगह पानी जमा हो गया.” पॉलीटेक्निक द्वारा इकट्ठा किया गया डाटा दिखाता है कि 13 और 14 अक्टूबर 2020 को सिर्फ़ दो दिनों में 234 मिलीमीटर बारिश हुई, जो औसत वार्षिक वर्षा का एक तिहाई है. “हम फ़सल काटने ही वाले थे कि बारिश शुरू हो गई और फिर रुकी ही नहीं.”

उनकी सोयाबीन की फ़सल बुरी तरह सड़ गई. शाहजी बताते हैं, “खेतों में पानी जमा हो गया. हम क़रीब 500 किलोग्राम उपज की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन मुश्किल से सिर्फ़ 200 किलोग्राम हासिल हुआ. हमारी मिर्ची जैसी सब्ज़ियों पर अच्छे फ़ूल आए थे, लेकिन वह सब बह गए. सूखा पड़ने पर हमें अपने नुक़्सान का एक अंदाज़ा होता है, लेकिन कटाई के समय होने वाली यह बेमौसम बरसात बहुत ही दुखदायी होती है.”

साल 2020 में पास हुए कृषि बिल 

सोयाबीन इस क्षेत्र की प्रमुख नक़दी फ़सल है. ज़्यादातर किसान अपनी उपज को तब तक नहीं बेचते, जब तक उसका अच्छा दाम नहीं मिलता है. पिछले साल की उपज को शाहजी ने मार्च 2020 तक रोककर रखा था, क्योंकि उनकी क़ीमत बढ़ रही थी. शाहजी बताते हैं, “मार्च में सोयाबीन 4,000-4,500 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से बिक रहा था और हमें उम्मीद थी कि क़ीमत 5,000 रुपए तक जाएगी. लेकिन जैसे ही लॉकडाउन हुआ, क़ीमतें तेज़ी से नीचे गिर गईं.” आजकल सोयाबीन का भाव 3,000 रुपए प्रति क्विंटल चल रहा है और उन्होंने लातूर कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) को अब तक 10 बैग बेच चुके हैं, जिससे वह अगले साल के लिए बीज ख़रीद सकें. जब हमने उनसे पूछा कि क्या यह नया कृषि बिल उनके लिए कुछ परिवर्तन लाएगा, तब उन्होंने बताया, “हम लातूर एपीएमसी में सालों से अपनी उपज बेचते आए हैं और हम कोई जोख़िम नहीं लेंगे [फ़सल कहीं और बेचने का].”

प्रोफेसर राजे, नए बिल पर चर्चा करते हुए कहते हैं: “किसान अपनी उपज एपीएमसी को बेचने के आदी हैं और वे इतनी आसानी से इस परिवर्तन को स्वीकार नहीं करेंगे. उन्हें इस बात का बिलकुल अंदाज़ा नहीं है कि एपीएमसी के बिचौलिए उन्हें ठग रहे हैं. भविष्य में लोगों को निजी मंडी और सार्वजनिक मंडी में अंतर समझ आ सकता है, जैसे हम लोगों को निजी अस्पतालों और सार्वजनिक अस्पतालों में अंतर दिखता है. यहां के किसानों के पास बहुत कम ज़मीन है और मुझे संदेह है कि कांट्रैक्ट आधारित खेती में उनके पास मोल-भाव करने का कोई अधिकार होगा.”

चूंकि शाहजी ने बैंक से औपचारिक तौर पर कोई भी ऋण नहीं लिया है, इसीलिए वह ऋण माफ़ी योजना का लाभ उठाने में असमर्थ हैं. दिसंबर 2019 में महाराष्ट्र सरकार ने महात्मा ज्योतिराव फुले किसान ऋण माफ़ी योजना की घोषणा की थी. वह कहते हैं, “सिर्फ़ भगवान ही हमें इस ऋण के चक्कर से निकाल सकते हैं.”

Editor's note

भक्ति केलकर, बेंगलुरु के अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में स्नातक कर रही हैं. यह स्टोरी कृषि क्षेत्र पर कोविड-19 के प्रभाव का अध्ययन करने वाली परियोजना के तहत सामने आई है. भक्ति ने ज्ञान प्रबोधिनि संस्था के साथ मिलकर, मराठवाड़ा क्षेत्र के पांच गांवों का अध्ययन किया. वह बताती हैं: “सर्वे के दौरान मैंने लॉकडाउन के प्रभाव को एक बड़े लेंस से देखने की कोशिश की. लेकिन, पारी के लिए इस स्टोरी को लिखते हुए मुझे कृषि अर्थव्यवस्था की एकल इकाई, यानी छोटे और सीमांत किसानों पर हुए लॉकडाउन और प्राकृतिक आपदाओं के बुरे असर की गहराई का अहसास हुआ.”

अनुवादः नेहा कुलश्रेष्ठ

नेहा कुलश्रेष्ठ, जर्मनी के गॉटिंगन विश्वविद्यालय से भाषा विज्ञान (लिंग्विस्टिक्स) में पीएचडी कर रही हैं. उनके शोध का विषय है भारतीय सांकेतिक भाषा, जो भारत के बधिर समुदाय की भाषा है. उन्होंने साल 2016-2017 में पीपल्स लिंग्विस्टिक्स सर्वे ऑफ़ इंडिया के द्वारा निकाली गई किताबों की शृंखला में से एक, भारत की सांकेतिक भाषा(एं) का अंग्रेज़ी से हिंदी में सह-अनुवाद भी किया है.